रायपुर – लोक निर्माण विभाग (PWD) की विद्युत यांत्रिकी शाखा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वर्ष 2022-23 और 2023-24 के दौरान जारी आठ टेंडरों में करीब 4.22 करोड़ रुपये के कार्यों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। मामला अब आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) तक पहुंच चुका है, जहां शिकायत में निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है।
यह मामला सिर्फ 4.22 करोड़ रुपये का नहीं, बल्कि सरकारी टेंडर व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर खड़े होते सवालों का है। आरोप है कि पूरी निविदा प्रक्रिया में निर्धारित नियमों की अनदेखी की गई और कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रक्रिया को प्रभावित किया गया।
शिकायत के अनुसार इन आठ टेंडरों में कई ऐसे निर्णय लिए गए, जिनसे यह संदेह गहरा जाता है कि कहीं पूरी प्रक्रिया पहले से तय तो नहीं थी। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रणाली की विश्वसनीयता पर सीधा हमला माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि टेंडर प्रक्रिया के दौरान नियमों का उल्लंघन हुआ था तो विभागीय अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? जिन बिंदुओं पर आपत्ति उठाई गई, उन्हें नजरअंदाज किसके निर्देश पर किया गया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी निगरानी की भूमिका निभाई या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं?
मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ ठेकेदारों ने वित्तीय लिफाफा नहीं खोलने का लिखित अनुरोध किया था, लेकिन इसके बावजूद उनकी ईएमडी (Earnest Money Deposit) राशि जब्त नहीं की गई और न ही उनके पंजीयन को निरस्त किया गया। यदि यह तथ्य सही हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर नियमों का पालन अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरीके से क्यों किया गया?
जानकारों का मानना है कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रत्येक चरण का कड़ाई से पालन अनिवार्य होता है। यदि किसी स्तर पर नियमों में ढील दी जाती है तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है। यही कारण है कि इस मामले में स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग लगातार तेज हो रही है।
शिकायतकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे ने आरोप लगाया है कि यदि पूरे मामले की तकनीकी और वित्तीय जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक विभाग का मामला नहीं बल्कि शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने और निविदा प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाने वाला प्रकरण है।
इस प्रकरण ने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। राज्य में लगातार ईओडब्ल्यू और एसीबी भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई कर रही हैं। ऐसे में यदि इस शिकायत में दम है तो क्या इस मामले में भी वैसी ही सख्त कार्रवाई होगी जैसी अन्य मामलों में देखने को मिली है? या फिर यह फाइल भी जांच के नाम पर लंबे समय तक दफ्तरों में घूमती रहेगी?
सरकारी विभागों में टेंडर प्रक्रिया का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और जनता के पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करना होता है। लेकिन यदि आरोपों के अनुसार प्रक्रिया को प्रभावित किया गया है तो इसका सीधा असर सरकारी खजाने और जनता के विश्वास दोनों पर पड़ता है। ऐसे मामलों में केवल विभागीय जांच से अधिक जरूरी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच मानी जाती है ताकि किसी भी तरह के प्रभाव या पक्षपात की आशंका समाप्त हो सके।
अब निगाहें ईओडब्ल्यू पर टिकी हैं। यदि जांच शुरू होती है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप कितने सही हैं, नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं, और यदि हुआ तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारी एवं संबंधित पक्ष कौन हैं। फिलहाल 4.22 करोड़ रुपये के इन आठ टेंडरों ने लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जांच के बाद ही यह तय होगा कि यह महज प्रक्रियागत चूक थी या फिर सरकारी व्यवस्था के भीतर किसी संगठित खेल की एक और कहानी।
