रायपुर – छत्तीसगढ़ में बिना मान्यता संचालित निजी स्कूलों के मुद्दे पर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। समाजसेवी एवं जन सेवक विकास तिवारी की शिकायत पर छत्तीसगढ़ लोक आयोग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए महज तीन दिनों के भीतर विविध प्रकरण क्रमांक 152/2026 (इलेक्ट्रॉनिक क्रमांक 3998) पंजीबद्ध कर लिया है। शिकायत 24 जुलाई 2026 को प्रस्तुत की गई थी। शिकायतकर्ता ने इसे आयोग द्वारा मामले की गंभीरता को स्वीकार किए जाने का संकेत बताया है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि स्कूल शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने माननीय उच्च न्यायालय, बिलासपुर में लंबित WPPIL No. 22/2016 तथा उसमें समय-समय पर पारित आदेशों की जानकारी लोक आयोग के समक्ष पूर्ण रूप से प्रस्तुत नहीं की। आरोप है कि आयोग को कथित रूप से अपूर्ण एवं भ्रामक प्रतिवेदन देकर गुमराह किया गया, पद का दुरुपयोग किया गया तथा बिना वैधानिक मान्यता संचालित निजी एवं प्री-प्राइमरी विद्यालयों को संरक्षण प्रदान किया गया।
शिकायत के अनुसार प्रदेश में कई निजी स्कूल बिना आवश्यक मान्यता के संचालन करते हुए छात्रों और अभिभावकों से फीस वसूलते रहे, लेकिन संबंधित अधिकारियों द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इससे न केवल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता प्रभावित हुई, बल्कि हजारों विद्यार्थियों और अभिभावकों के हित भी प्रभावित हुए।
इस मामले में लोक आयोग ने स्कूल शिक्षा विभाग के सात वरिष्ठ अधिकारियों को अनावेदक बनाया है। इनमें सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी, उप सचिव फरिया आलम, लोक शिक्षण संचालनालय के संचालक ऋतुराज रघुवंशी, पूर्व संयुक्त संचालक योगेश शिवहरे, पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी आर.एल. ठाकुर, सहायक संचालक हिमांशु भारती तथा उप संचालक आशुतोष चावरे के नाम शामिल हैं।
शिकायतकर्ता विकास तिवारी का कहना है कि मामला केवल लोक आयोग के समक्ष कथित रूप से भ्रामक जानकारी प्रस्तुत करने का नहीं है, बल्कि यह उच्च न्यायालय के आदेशों के पालन, शिक्षा विभाग की जवाबदेही और बिना मान्यता संचालित विद्यालयों पर कार्रवाई जैसे गंभीर सार्वजनिक हित के मुद्दों से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि लोक आयोग द्वारा शिकायत प्राप्त होने के तीन दिनों के भीतर प्रकरण दर्ज किया जाना यह दर्शाता है कि शिकायत में उठाए गए आरोप प्रथम दृष्टया परीक्षण योग्य पाए गए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आयोग निष्पक्ष जांच कर तथ्यों के आधार पर दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।
हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि शिकायत दर्ज होना आरोपों के सिद्ध होने के बराबर नहीं है। मामले में अंतिम निष्कर्ष लोक आयोग की जांच और उसके निर्णय के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल इस प्रकरण ने प्रदेश के शिक्षा विभाग और बिना मान्यता संचालित निजी विद्यालयों के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
