जगदलपुर – छत्तीसगढ़ के बस्तर पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय से एक ऐसा चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है जिसने पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है। जिस कार्यालय से कानून व्यवस्था की निगरानी होती है, वहीं सरकारी वेतन आहरण में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की हेराफेरी किए जाने का मामला उजागर हुआ है। शुरुआती जांच में करीब 1.5 से 2 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आने के बाद पुलिस ने अपने ही कार्यालय के तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है। जांच अभी शुरुआती दौर में है और आशंका जताई जा रही है कि इस पूरे खेल में कई और लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
मामले का खुलासा नियमित शासकीय ऑडिट के दौरान हुआ। एसपी कार्यालय की विभिन्न शाखाओं का समय-समय पर इंटरनल और एक्सटर्नल ऑडिट कराया जाता है। इसी प्रक्रिया में वेतन शाखा के रिकॉर्ड और भुगतान में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं। इसके बाद डीएसपी मुख्यालय स्तर पर प्राथमिक जांच कराई गई, जिसमें वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि हुई। जांच के बाद तत्काल अपराध दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी गई।
जांच में सामने आया कि वेतन शाखा में पदस्थ आरक्षक क्रमांक 450 गिरीश राय वेतन देयक की सॉफ्ट कॉपी में बदलाव करता था। आरोप है कि वह वेतन जारी होने से पहले दस्तावेजों में हेरफेर कर अपने और अपने साथियों के वेतन एवं विभिन्न भत्तों की राशि बढ़ा देता था। इतना ही नहीं, जांच में यह भी सामने आया कि डीडीओ के डिजिटल हस्ताक्षर वाली पेन ड्राइव का दुरुपयोग कर फर्जी तरीके से वेतन देयकों को तैयार किया गया और सरकारी राशि का गबन किया गया।
पुलिस जांच में आरक्षक क्रमांक 289 राजकुमार कतलम और डीएसएफ आरक्षक क्रमांक 4003 हेमंत मैथ्यू की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई। पुलिस के अनुसार तीनों आरोपियों ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर वेतन देयकों में कूटरचना की, विभिन्न भत्तों की राशि बढ़ाई और सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपये निकाल लिए। पूछताछ के दौरान मुख्य आरोपी गिरीश राय ने वेतन संबंधी गड़बड़ी स्वीकार करने की बात भी सामने आई है।
जांच के दौरान एक और बड़ा खुलासा हुआ है। पुलिस को जानकारी मिली है कि कुछ कर्मचारियों के बैंक खातों में लोन देने के नाम पर अतिरिक्त वेतन राशि ट्रांसफर की जाती थी। बाद में वह अतिरिक्त रकम नकद वापस ले ली जाती थी। इस पूरे तरीके से यह संदेह गहरा गया है कि घोटाले का दायरा केवल तीन कर्मचारियों तक सीमित नहीं हो सकता। पुलिस अब ऐसे सभी खातों और कर्मचारियों की सूची तैयार कर रही है जिनके खातों में अतिरिक्त राशि पहुंची थी। सभी से पूछताछ की जाएगी ताकि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके।
प्राथमिक जांच के आधार पर पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 316(5), 338, 336(3), 340, 61(2) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(C) के तहत अपराध दर्ज किया है। तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया।
बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने कहा कि मामला बेहद गंभीर है और जांच अभी प्रारंभिक चरण में है। जैसे-जैसे नए तथ्य सामने आएंगे, कार्रवाई का दायरा भी बढ़ाया जाएगा। बैंक खातों, डिजिटल रिकॉर्ड, वेतन देयकों और वित्तीय लेन-देन की गहन जांच की जा रही है। यदि जांच में अन्य अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस सनसनीखेज खुलासे ने पुलिस विभाग की वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि नियमित ऑडिट नहीं होता तो क्या करोड़ों रुपये का यह कथित खेल और लंबे समय तक चलता रहता? डिजिटल हस्ताक्षर जैसी संवेदनशील प्रणाली का दुरुपयोग कैसे हुआ, इसकी जिम्मेदारी किसकी है और निगरानी तंत्र आखिर क्यों विफल रहा—इन सभी सवालों के जवाब अब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।
फिलहाल इतना तय है कि बस्तर एसपी कार्यालय का यह कथित करोड़ों का वेतन घोटाला प्रदेश के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में शामिल हो सकता है। आने वाले दिनों में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे कई और बड़े नाम और नए खुलासे सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
