रायपुर/नई दिल्ली – वामपंथी और प्रगतिशील राजनीतिक हलकों में वैचारिक मतभेद अब खुली बहस और आरोप-प्रत्यारोप का रूप लेते नजर आ रहे हैं। Northern Coordination Committee (NCC) और उससे जुड़े संगठनों की कार्यशैली को लेकर सामने आए एक आलोचनात्मक दस्तावेज ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। दस्तावेज में NCC पर वैचारिक असहमति को स्वीकार न करने और आलोचनात्मक आवाजों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश के आरोप लगाए गए हैं।
विवाद का सबसे बड़ा केंद्र ‘दस्तक’ पत्रिका की प्रतियां कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से जलाए जाने की घटना है। दस्तावेज के मुताबिक, ‘मजदूर अधिकार संगठन’ से जुड़े तीन प्रतिनिधियों ने पत्रिका की प्रतियां जलाकर विरोध दर्ज कराया। लेखक ने इस घटना को महज राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि वैचारिक असहमति से निपटने के तरीके पर गंभीर सवाल के रूप में उठाया है।
बहस का जवाब आग से नहीं, तर्क से देने की बात
आलोचनात्मक दस्तावेज में ‘दस्तक’ और उसकी संपादकीय टीम के लंबे समय से लोकतांत्रिक अधिकारों, जन आंदोलनों और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर किए जा रहे लेखन का उल्लेख किया गया है।
लेखक का तर्क है कि किसी पत्रिका या राजनीतिक विचारधारा से असहमति हो तो उसका जवाब लेख, पर्चे, वैकल्पिक दस्तावेज और सार्वजनिक बहस के जरिए दिया जाना चाहिए। किसी प्रकाशन की प्रतियां जलाना वैचारिक संघर्ष की लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
दस्तावेज में भारतीय वामपंथ के इतिहास का हवाला देते हुए कहा गया है कि गंभीर वैचारिक मतभेदों के दौर में भी राजनीतिक धाराओं ने अपने विचारों को दस्तावेजों और बहस के माध्यम से सामने रखा। इसी आधार पर लेखक ने सवाल उठाया है कि क्या आज की राजनीतिक असहमति को बहस की जगह बहिष्कार और विरोध के प्रतीकों से जवाब देना उचित है?
NCC की कार्यशैली पर ‘नव-नाजी’ प्रवृत्तियों से तुलना
दस्तावेज का सबसे विवादास्पद हिस्सा NCC और उसके सहयोगी संगठनों की कथित राजनीतिक शैली की तुलना फासीवादी तथा ‘नव-नाजी’ प्रवृत्तियों से करता है।
लेखक ने 1930 के दशक में नाजी जर्मनी में किताबें जलाए जाने की घटनाओं का संदर्भ देते हुए आरोप लगाया है कि असहमति रखने वालों को दुश्मन के रूप में पेश करना और उनके विचारों को दबाने की कोशिश लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति के लिए खतरनाक संकेत है।
हालांकि, ‘नव-नाजी’ जैसी तुलना दस्तावेज के लेखक की राजनीतिक व्याख्या है और प्रस्तुत सामग्री के आधार पर इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती।
‘प्रति-क्रांतिकारी’ कहकर आलोचकों को खारिज करने का आरोप
दस्तावेज में NCC पर यह भी आरोप लगाया गया है कि वह लंबे समय से जन आंदोलनों से जुड़े कुछ लोगों और संगठनों को ‘प्रति-क्रांतिकारी’ अथवा आंदोलन विरोधी बताकर खारिज करता रहा है।
लेखक का कहना है कि वैचारिक मतभेद किसी भी राजनीतिक आंदोलन का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन असहमति रखने वालों को दुश्मन घोषित करने की प्रवृत्ति अंततः संवाद, लोकतांत्रिक बहस और संगठनात्मक एकता को कमजोर कर सकती है।
साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि कोई संगठन खुद को किसी विचारधारा या आंदोलन का ‘एकमात्र वैध उत्तराधिकारी’ मानता है तो केवल इस दावे से उसकी राजनीतिक वैधता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती।
आपसी टकराव से कमजोर होगा जनआंदोलन?
दस्तावेज में सबसे महत्वपूर्ण चिंता प्रगतिशील और जनवादी संगठनों के बीच बढ़ते आंतरिक संघर्ष को लेकर जताई गई है। लेखक के अनुसार, जब मजदूर-किसान आंदोलनों, नागरिक स्वतंत्रताओं और जन अधिकारों से जुड़े मुद्दों के सामने पहले ही अनेक चुनौतियां मौजूद हैं, तब आपसी संघर्ष और संगठनात्मक विभाजन व्यापक आंदोलनों की ताकत को कमजोर कर सकते हैं।
युवा कार्यकर्ताओं और वामपंथी संगठनों से जुड़े लोगों से भी सवाल किया गया है कि आक्रामक और बहिष्कारवादी राजनीतिक शैली आखिर आंदोलन को मजबूत करती है या उसे आम जनता से दूर ले जाती है?
‘एकता बनाम असहमति’ की बहस फिर तेज
‘दस्तक’ की प्रतियां जलाए जाने की कथित घटना ने वामपंथी राजनीति के भीतर पहले से मौजूद वैचारिक मतभेदों को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। राजनीतिक विरासत, संगठनात्मक वैधता और असहमति के अधिकार को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।
फिलहाल इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राजनीतिक मतभेद चाहे कितने भी गहरे क्यों न हों, उनका जवाब बहस, तर्क और वैकल्पिक विचारों से दिया जाए या विरोध के ऐसे तरीकों से जो संवाद के रास्ते बंद कर दें।
आलोचनात्मक दस्तावेज ने प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताकतों से मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखने की अपील की है। अब देखना होगा कि इस विवाद पर NCC या उससे जुड़े संगठनों की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं।
