रायपुर – छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन अब सिर्फ “हर घर जल” की योजना नहीं रह गई, बल्कि यह सवालों, आरोपों, अधूरे निर्माण, लंबित भुगतान और कथित कमीशनखोरी के आरोपों के बीच उलझा हुआ एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। राजधानी रायपुर में लगभग 2200 करोड़ रुपये के लंबित भुगतान की मांग को लेकर ठेकेदारों का सड़क पर उतरना केवल आर्थिक संकट का संकेत नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रदर्शन कर रहे ठेकेदारों का आरोप है कि उन्हें वर्षों से भुगतान नहीं मिला, जबकि दूसरी ओर अधिकारियों द्वारा करीब 15 से 20 प्रतिशत तक कमीशन मांगने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए जा रहे हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न यही है—वे अधिकारी कौन हैं? क्या उनके नाम सार्वजनिक होंगे या फिर पूरा मामला फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?

दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह है कि छत्तीसगढ़ एक सामान्य राज्य होने के कारण जल जीवन मिशन में 50 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 50 प्रतिशत राज्य सरकार देती है। केंद्र से राशि किस्तों में जारी होती है, जो राज्य की हिस्सेदारी, उपयोगिता प्रमाणपत्र (यूसी) और कार्य प्रगति पर निर्भर करती है। यानी यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया अटकती है तो भुगतान भी प्रभावित होता है। लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर ऐसी स्थिति बनी क्यों?
इसी बीच केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की निरीक्षण टीम ने राज्य के कई जिलों में जल जीवन मिशन के कार्यों का भौतिक सत्यापन किया। निरीक्षण के दौरान कई स्थानों पर घटिया गुणवत्ता की पाइपलाइन, अधूरे निर्माण, बिना जलापूर्ति वाले नल कनेक्शन, टंकियों की खराब गुणवत्ता और अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन जैसी शिकायतें सामने आने की खबरें भी सार्वजनिक हुईं। हालांकि अभी तक इन निरीक्षणों के आधार पर सीबीआई या ईडी जैसी किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा व्यापक आपराधिक जांच शुरू होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है। यदि गुणवत्ता खराब मिली, यदि योजनाएं अधूरी मिलीं, यदि कई गांवों में नल तो लग गए लेकिन पानी नहीं पहुंचा, यदि बिना कार्य पूर्ण किए भुगतान हुआ, तो फिर जिम्मेदार कौन है?
क्या सिर्फ ठेकेदार दोषी हैं?
क्या केवल अभियंता जिम्मेदार हैं?
या फिर पूरा प्रशासनिक ढांचा कहीं न कहीं जवाबदेही से बचता नजर आ रहा है?
राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के माध्यम से इस योजना का संचालन किया जाता है, जबकि जिला स्तर पर कलेक्टर को समन्वय और निगरानी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। ऐसे में यदि किसी जिले में कार्य अधूरे हैं या गुणवत्ता पर सवाल हैं तो क्या वहां की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में नहीं आती?

आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे का कहना है कि जब योजना में केंद्र सरकार की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है और करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब प्रत्येक जिले में कलेक्टर को प्रभावी नोडल अधिकारी बनाकर जवाबदेही तय की जानी चाहिए। उनका सुझाव है कि यदि व्यापक अनियमितताओं की आशंका है। तो राज्य सरकार को एक स्वतंत्र एसआईटी गठित कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान हो सके।

सबसे बड़ा प्रश्न कार्रवाई को लेकर भी है। यदि गुणवत्ता में गड़बड़ी मिली तो— कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई?
कितने अभियंताओं को निलंबित किया गया?
कितने ठेकेदारों को नोटिस जारी हुए?
कितनों के टेंडर निरस्त या ब्लैकलिस्ट किए गए?
और जिन अधिकारियों पर कथित कमीशन मांगने के आरोप लगे, क्या उनकी पहचान सार्वजनिक होगी?

सरकार समय-समय पर अधिकारियों पर कार्रवाई, ठेकेदारों को नोटिस और कुछ एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट करने की जानकारी देती रही है, लेकिन करोड़ों रुपये के भुगतान और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जनता अब विस्तृत और पारदर्शी जवाब चाहती है।
वर्ष 2026 में केंद्र और राज्य सरकार ने जल जीवन मिशन 2.0 के लिए एमओयू भी किया है, जिसमें गुणवत्ता, निगरानी और पारदर्शिता मजबूत करने की बात कही गई। लेकिन जमीनी तस्वीर यह बताती है कि कई गांवों में पाइपलाइन बिछी है, नल लगे हैं, टंकियां खड़ी हैं, लेकिन पानी अभी भी लोगों के घरों तक नहीं पहुंचा।
यानी करोड़ों रुपये खर्च हुए, ठेकेदार भुगतान मांग रहे हैं, अधिकारी आरोपों में घिरे हैं और सबसे बड़ा नुकसान उस आम नागरिक का हो रहा है जिसे आज भी हर सुबह पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
व्यंग्य यही है कि योजना का नाम है “जल जीवन मिशन”… लेकिन कहीं पानी नहीं, कहीं भुगतान नहीं, कहीं जवाब नहीं। फाइलों में पाइपलाइन दौड़ रही है, कागजों में नल बह रहे हैं, भाषणों में हर घर जल पहुंच चुका है… लेकिन गांव का नागरिक आज भी खाली बाल्टी लेकर आसमान की ओर देख रहा है।
अब फैसला सरकार को करना है- क्या यह लड़ाई सिर्फ 2200 करोड़ के भुगतान तक सीमित रहेगी या फिर उन सवालों के जवाब भी मिलेंगे जो पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर खड़े हो चुके हैं।
