रायपुर – सरकारी तंत्र में अक्सर कहा जाता है कि कानून सबके लिए बराबर होता है, लेकिन कुछ मामलों को देखकर लगता है कि कुछ अधिकारियों के लिए नियम सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (पीआरडी) के पूर्व मुख्य अभियंता हरिओम शर्मा का मामला इन दिनों इसी वजह से चर्चा में है। सेवा से सेवानिवृत्त होने के महज 8 दिन बाद उन्हें नया रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण (एनआरडीए) में संविदा पर मुख्य अभियंता बना दिया गया। सवाल यह है कि क्या सरकार के पास अनुभवी अधिकारियों की इतनी कमी थी, या फिर दागदार रिकॉर्ड भी अब योग्यता का नया पैमाना बन गया है?

मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि उपलब्ध दस्तावेजों और पत्राचार के अनुसार हरिओम शर्मा के खिलाफ लंबे समय से भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों की जांच चल रही है। शिकायतों में यह भी उल्लेख है कि ईओडब्ल्यू/एसीबी के अपराध क्रमांक 27/2019 से संबंधित कार्रवाई में विभाग से अभियोजन स्वीकृति मांगी गई थी। यदि जांच और कानूनी प्रक्रिया लंबित है तो फिर संविदा नियुक्ति किस आधार पर और किस जल्दबाजी में कर दी गई?

व्यंग्य यही है कि आम कर्मचारी की फाइल महीनों तक एक टेबल से दूसरी टेबल घूमती रहती है, लेकिन यहां सेवानिवृत्ति के केवल आठ दिन बाद ही संविदा का “वीआईपी पास” जारी हो गया। ऐसा लगता है मानो विभाग ने पहले से ही कुर्सी सुरक्षित रख छोड़ी थी कि “आप जाइए नहीं, बस पद का नाम बदल जाएगा।”
दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि हरिओम शर्मा की प्रारंभिक नियुक्ति तदर्थ आधार पर हुई थी। शिकायतकर्ता राकेश चौबे का दावा है कि मूल नियुक्ति से लेकर पदोन्नति तक कई बिंदुओं पर नियमों के उल्लंघन की जांच होनी चाहिए। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल है।
इतना ही नहीं, शिकायत में निर्माण कार्यों में कथित अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि कई निर्माण कार्य समय से पहले खराब हुए और गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठे। यदि इन आरोपों की जांच पहले से चल रही है तो ऐसे अधिकारी को संविदा पर दोबारा वही जिम्मेदारी देना क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की घोषित नीति से मेल खाता है?
सबसे दिलचस्प पहलू सामान्य प्रशासन विभाग की 20 जनवरी 2017 की गाइडलाइन है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी अधिकारी के खिलाफ एसीबी या ईओडब्ल्यू में गंभीर प्रकरण लंबित हो तो परिस्थितियों के अनुसार प्रशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस मामले में उस गाइडलाइन को नजरअंदाज किया गया, या फिर नियमों की किताब सिर्फ कमजोर कर्मचारियों के लिए लिखी गई है?

शिकायतकर्ता राकेश चौबे ने मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में मांग की है कि हरिओम शर्मा के खिलाफ लंबित मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, संविदा नियुक्ति की समीक्षा की जाए तथा जांच पूरी होने तक उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा जाए। साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि शासन की ओर से सक्षम अधिवक्ता नियुक्त कर न्यायालय में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित की जाए।

अब सबसे बड़ा सवाल जनता पूछ रही है—क्या भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी को संविदा नियुक्ति देना “सुशासन” का नया मॉडल है? क्या ईमानदार अधिकारी अब केवल दर्शक बनकर रह जाएंगे और विवादों में घिरे अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद भी मलाईदार पदों पर विराजमान रहेंगे?
सरकारी गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि किसी सामान्य कर्मचारी पर इतनी गंभीर जांच लंबित होती तो शायद उसे कार्यालय के गेट तक पहुंचने की अनुमति भी मुश्किल से मिलती। लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। मानो संदेश यही हो कि “जांच चलती रहेगी, कुर्सी भी चलती रहेगी।”
हालांकि यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि हरिओम शर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोप शिकायतों, उपलब्ध दस्तावेजों और पत्राचार पर आधारित हैं। इन आरोपों पर अंतिम निर्णय सक्षम जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया द्वारा ही किया जाएगा। जब तक जांच पूरी नहीं होती, किसी भी व्यक्ति को दोषी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि जिस तेजी से संविदा नियुक्ति हुई है, उसने पारदर्शिता, जवाबदेही और सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर जांच पहले होगी या इनाम पहले? यही सवाल इस पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य भी है।
