रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से जुड़े करीब 30 साल पुराने बहुचर्चित हाउसिंग लोन घोटाले में आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए करीब 1200 पन्नों की चार्जशीट अदालत में पेश कर दी है। लंबे समय तक चली जांच के बाद अब यह मामला अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। जांच में करोड़ों रुपये के फर्जीवाड़े, फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोन स्वीकृत कराने और सरकारी व्यवस्था में गंभीर अनियमितताओं का खुलासा हुआ है।
EOW की जांच के अनुसार, 186 फर्जी सदस्यों के नाम पर करीब 1.86 करोड़ रुपये का हाउसिंग लोन स्वीकृत कराया गया। इसके लिए फर्जी आवेदन पत्र, नकली फोटो, जाली हस्ताक्षर और अन्य दस्तावेज तैयार किए गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर लोन मंजूर कर राशि निकाल ली गई।
मौके पर पहुंचे तो मकान ही नहीं मिले
जांच के दौरान सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ, जब EOW की टीम उन स्थानों पर पहुंची जहां लोन लेकर मकान बनाए जाने का दावा किया गया था। कई जगहों पर मकानों का कोई अस्तित्व ही नहीं मिला, जबकि रिकॉर्ड में निर्माण पूरा होना दर्शाया गया था। इतना ही नहीं, बिना किसी वास्तविक निरीक्षण के मकान निर्माण पूर्ण होने के प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए गए थे।

1.86 करोड़ का लोन, ब्याज के साथ 104 करोड़ की देनदारी
जांच में सामने आया कि शुरुआत में करीब 1.86 करोड़ रुपये का लोन लिया गया था, लेकिन वर्षों तक राशि वापस नहीं होने और लगातार ब्याज जुड़ने के कारण अब यह बकाया बढ़कर करीब 104 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इससे सहकारी आवास व्यवस्था को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।
बसें खरीदीं, निजी संपत्तियां बनाई
EOW की जांच में यह आरोप भी सामने आया है कि घोटाले से प्राप्त धन का इस्तेमाल बसें खरीदने और निजी संपत्तियां खड़ी करने में किया गया। जांच एजेंसी इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि रकम किन-किन लोगों तक पहुंची और उसका उपयोग कहां-कहां किया गया।
पांच अधिकारी-कर्मचारी आरोपी
इस मामले में समिति और राज्य सहकारी आवास संघ के पांच अधिकारी एवं कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया है। सभी के खिलाफ अपराध दर्ज कर अदालत में चार्जशीट पेश कर दी गई है। अब कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपों और सबूतों की कानूनी जांच होगी।
तीन दशक बाद न्यायिक प्रक्रिया शुरू
करीब 30 साल पुराने इस घोटाले में चार्जशीट दाखिल होने के साथ अब न्यायिक प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं और मामले से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका पर भी जांच का दायरा बढ़ सकता है।

यह मामला न केवल सहकारी आवास व्यवस्था में हुए बड़े वित्तीय घोटाले की कहानी है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि फर्जी दस्तावेजों और बिना भौतिक सत्यापन के करोड़ों रुपये का लोन आखिर कैसे स्वीकृत होता रहा। अब सबकी नजर अदालत की सुनवाई और EOW की आगे की कार्रवाई पर टिकी है।
