रायपुर – राजधानी को स्मार्ट सिटी का तमगा जरूर मिल गया, लेकिन बारिश ने शहर के विकास के दावों की ऐसी तस्वीर सामने ला दी है, जिसे देखकर सवाल उठना लाजिमी है। अमलीडीह के गांधी नगर में बारिश के बाद सड़कें तालाब बन रही हैं, नालियां उफन रही हैं और घरों में गंदा पानी घुस रहा है। इस बदहाल व्यवस्था के बीच अब पूरा मामला कथित तौर पर रामा बिल्डर्स द्वारा नाले की जमीन पर बनाए गए पुल को लेकर गरमा गया है।

स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि नाले की जमीन प्रभावित होने और पुल निर्माण के कारण नाले की चौड़ाई कम हुई है। इससे पानी की निकासी बाधित हो रही है और बारिश का पानी गांधी नगर की सड़कों और घरों तक पहुंच रहा है। मामला इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि जोन-10 के कमिश्नर मुनेश्वर शर्मा ने स्पष्ट कहा है कि रामा बिल्डर्स द्वारा बनाए गए पुल के लिए नगर निगम से कोई अनुमति नहीं ली गई है।
यही बयान अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है—जब अनुमति नहीं थी तो पुल बना कैसे? और यदि पुल बन गया तो निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी कब हुई?
बिना अनुमति पुल… फिर भी निर्माण कैसे?
स्थानीय लोगों के मुताबिक नाले के ऊपर पुल निर्माण से पहले नगर निगम से अनुमति लिया जाना जरूरी था। लेकिन जोन कमिश्नर के अनुसार इस निर्माण की कोई अनुमति निगम से नहीं ली गई।

यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो यह सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं, बल्कि निगम की निगरानी व्यवस्था का भी है। निर्माण के दौरान संबंधित विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ी? शिकायतों के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या नाले की जमीन का पहले ही सीमांकन कराया गया था? इन सवालों के जवाब अब गांधी नगर के लोग मांग रहे हैं।
‘नाला’ सिकुड़ा तो पानी ने बदला रास्ता
स्थानीय लोगों का कहना है कि गांधी नगर में जलभराव का सबसे बड़ा कारण प्राकृतिक जल निकासी मार्ग का बाधित होना है। जहां पहले नाले का स्वरूप था, वहां कई स्थानों पर नाला संकरा होकर नाली जैसा रह गया है। पटवारी स्तर से भी नाले के मूल स्वरूप में बदलाव और चौड़ाई कम होने की बात सामने आने का दावा किया जा रहा है। बताया गया है कि कई जगह नाले की चौड़ाई अधिकतम करीब 10 फीट से भी कम रह गई है। ऐसे में पूरे नाले का सीमांकन कराया जाए तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है कि नाले की कितनी जमीन प्रभावित हुई है।

यानी गांधी नगर का पानी सिर्फ बारिश से नहीं रुक रहा—आरोप है कि पानी का रास्ता ही धीरे-धीरे सिकुड़ गया है।
दो-तीन फीट पानी और घरों में घुसा गंदा पानी
बारिश के दौरान गांधी नगर की स्थिति भयावह हो जाती है। सड़क पर दो से तीन फीट तक पानी जमा होने की शिकायत है। नालियों का पानी सड़क पर बह रहा है। तेज बहाव के कारण पैदल चलना मुश्किल है। बाइक और साइकिल सवारों के लिए सड़क जोखिम भरी हो गई है।
स्कूल जाने वाले बच्चे सबसे ज्यादा परेशान हैं। पानी और कीचड़ के बीच कई बच्चे गिर रहे हैं। सुबह दफ्तर जाने वाले लोग भी जल्दबाजी में फिसलकर चोटिल होने के खतरे से जूझ रहे हैं।
लेकिन इस पूरी समस्या का सबसे दर्दनाक अध्याय पांच साल के काव्यांश की मौत है। नाले में गिरकर मासूम की जान चली गई। हादसे के बाद मोहल्ले में गुस्सा भी है और डर भी।
मासूम की मौत के बाद घेरा जोन कार्यालय
काव्यांश की मौत के बाद स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने जोन कार्यालय का घेराव किया। लोगों ने मांग की कि नाले की जमीन पर जहां भी अतिक्रमण है, उसकी निष्पक्ष जांच हो और तत्काल कार्रवाई की जाए।

स्थानीय निवासी धीरेन्द्र साहू ने मांग की है कि वार्ड में नाले की जमीन पर हुए सभी कब्जों की जांच कर कार्रवाई की जाए। उनका आरोप है कि रामा बिल्डर्स द्वारा नाले की जमीन पर कब्जा कर बिना अनुमति पुल बनाया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि निगम के पास पुल निर्माण की अनुमति नहीं थी तो फिर प्रशासन ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
क्रांतिसेना के प्रदेश उपाध्यक्ष दिलेश्वर साहू ने चेतावनी दी है कि यदि नाले को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया गया तो आंदोलन को सड़क से लेकर विधानसभा और न्यायालय तक ले जाया जाएगा।
जोन कमिश्नर का बयान बढ़ाता है सवाल
जोन-10 कमिश्नर मुनेश्वर शर्मा ने कहा है कि नाले पर अतिक्रमण करने वालों को नोटिस जारी किया जाएगा और नाले को अतिक्रमण मुक्त कराया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि रामा बिल्डर्स द्वारा पुल बनाने के लिए नगर निगम से कोई अनुमति नहीं ली गई है।

अब यही बयान निगम प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती है। अगर अनुमति नहीं ली गई थी तो कार्रवाई कब होगी? क्या पुल की वैधता की जांच होगी? क्या नाले की जमीन का सीमांकन कराया जाएगा? और क्या जल निकासी प्रभावित करने वाले सभी निर्माण हटाए जाएंगे?
मेयर बोलीं—शिकायत मिली तो कार्रवाई होगी
मेयर मीनल चौबे का कहना है कि अमलीडीह गांधी नगर में नाले पर कब्जे की शिकायत उनके पास नहीं आई है। उन्होंने कहा कि यदि नाले पर कब्जा हुआ है तो निगम कार्रवाई करेगा और शिकायत मिलने पर अधिकारियों से चर्चा कर उचित कार्रवाई कराई जाएगी।
वहीं नगर निगम नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने पूरे नाले का सीमांकन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि रामा बिल्डर सहित कई लोगों पर नाले पर कब्जे के आरोप हैं तो सीमांकन से स्थिति स्पष्ट होगी और जल निकासी का रास्ता बहाल किया जा सकेगा।
पार्षद बोले—बिल्डर को नोटिस जारी
वार्ड पार्षद विनय निर्मलकर का कहना है कि नाले पर अतिक्रमण उनके कार्यकाल में नहीं हुआ है। उन्होंने पिछले निगम शासन पर जिम्मेदारी डालते हुए कहा कि अतिक्रमण पुराने समय से है। साथ ही उन्होंने बताया कि रामा बिल्डर्स को नोटिस जारी किया गया है।

लेकिन जनता का सवाल इससे भी आगे है—अतिक्रमण कब हुआ, यह बाद की बात है; उसे हटाएगा कौन और कब?
टेंडर निकला, नाला नहीं बना
गांधी नगर में नाली निर्माण के लिए टेंडर जारी होने की बात भी सामने आई है। लेकिन ठेकेदार की प्रक्रिया में देरी के कारण निर्माण समय पर शुरू नहीं हो सका। अब बारिश के कारण काम की प्रगति और प्रभावित हो गई है।
कागज पर योजना, जमीन पर पानी—यही गांधी नगर की कहानी बन गई है।
स्मार्ट सिटी या ‘सिर्फ कागजों’ की स्मार्टनेस?
रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन गांधी नगर जैसे इलाकों में बारिश के बाद हालात सवाल पूछ रहे हैं। बजबजाती नालियां, कीचड़, मच्छर, गंदगी, जलभराव और सड़क के गड्ढे लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं।
जनता टैक्स देती है, लेकिन बारिश में उसी जनता को अपने घर और बच्चों की सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
अब सवाल रामा बिल्डर्स से भी है और निगम से भी—अगर पुल के लिए अनुमति नहीं ली गई थी, तो निर्माण की जांच कब होगी? नाले की जमीन का सीमांकन कब होगा? कथित अतिक्रमण कब हटेगा? और गांधी नगर के लोगों को जलभराव से स्थायी राहत कब मिलेगी?
काव्यांश की मौत के बाद अब यह मामला महज जलभराव का नहीं रहा। यह जवाबदेही का सवाल है। लोगों को आश्वासन नहीं, नाले का सीमांकन, अतिक्रमण पर कार्रवाई और जल निकासी का स्थायी समाधान चाहिए।
गांधी नगर पूछ रहा है—बारिश हर साल आएगी, लेकिन क्या हर साल नाला ही पानी का रास्ता रोकता रहेगा?
