मोहला-मानपुर – छत्तीसगढ़ के मोहला-मानपुर जिले के खड़गांव थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मुरारगोटा में करीब 25 एकड़ सरकारी भूमि को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। लगभग 70 वर्षों से खेती करने का दावा करने वाले परिवार ने गंभीर आरोप लगाया है कि राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेरफेर कर सरकारी जमीन पर एक बाहरी व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया और बाद में उस जमीन की खरीद-फरोख्त भी कर दी गई। इस पूरे मामले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली, सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा और ग्रामसभा की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, विवादित भूमि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में छोटे झाड़ और बड़े झाड़ जंगल की श्रेणी में दर्ज रही है। परिवार का कहना है कि उनके पूर्वज वर्ष 1958-59 से लगातार इस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं और गांव के अधिकांश लोग इस तथ्य से परिचित हैं। इसके बावजूद कथित रूप से रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिस जमीन को सरकारी और वन प्रकृति की भूमि बताया जा रहा है, उसका कथित रूप से आगे विक्रय भी कर दिया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि यह भूमि वास्तव में सरकारी रिकॉर्ड में जंगल अथवा छोटे झाड़ श्रेणी की थी, तो बिना वैधानिक प्रक्रिया और ग्रामसभा की अनुमति के किसी भी व्यक्ति के नाम दर्ज होना अपने आप में बड़ा सवाल है।
परिवार का आरोप है कि वर्ष 2007 से लगातार शिकायतें संबंधित राजस्व अधिकारियों, प्रशासन और अन्य सक्षम अधिकारियों को दी जा रही हैं। ग्रामसभा ने भी कई बार प्रस्ताव पारित कर कथित रूप से दर्ज नाम हटाने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की, लेकिन आज तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वर्षों बीत जाने के बावजूद जांच लंबित रहने से उन्हें न्याय नहीं मिल सका।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी जमीन को बचाने के बजाय रिकॉर्ड में कथित हेरफेर कर निजी स्वामित्व का रास्ता बनाया गया। उनका कहना है कि यदि समय रहते पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो भविष्य में सरकारी जमीनों पर इस तरह के मामलों को बढ़ावा मिलेगा।

मामले के सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी सरकारी या वन भूमि के रिकॉर्ड में बदलाव हुआ है तो यह केवल एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि पूरे गांव और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। लोगों ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पूरे रिकॉर्ड की जांच की मांग उठाई है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि कोई भूमि पुराने रिकॉर्ड में वन भूमि, बड़े झाड़ या छोटे झाड़ के रूप में दर्ज है, तो उसके संबंध में किसी भी प्रकार का नामांतरण, स्वामित्व परिवर्तन या विक्रय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही संभव है। ऐसे मामलों में राजस्व और वन विभाग की जांच के साथ संबंधित कानूनों का पालन अनिवार्य होता है। यदि रिकॉर्ड में अनियमितता या फर्जीवाड़ा सिद्ध होता है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि, इस पूरे मामले में अब तक संबंधित राजस्व विभाग या प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है। इसलिए आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय जांच पूरी होने और सक्षम अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल मुरारगोटा का यह भूमि विवाद पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। वर्षों से लंबित जांच और सरकारी रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी के आरोपों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाएगा या फिर यह विवाद भी वर्षों तक फाइलों में दबा रहेगा।
