रायगढ़ – पुसौर नगर पंचायत में भारतीय जनता पार्टी को स्थानीय स्तर पर बड़ा झटका लगा है। नगर पंचायत के 8 भाजपा पार्षदों ने एक साथ पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। सभी पार्षदों ने अपना त्यागपत्र जिला भाजपा अध्यक्ष को भेजा है। एक साथ इतने पार्षदों के इस्तीफे से स्थानीय राजनीति में खलबली मच गई है और भाजपा संगठन के सामने अब स्थिति संभालने की चुनौती खड़ी हो गई है।
अध्यक्ष की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी!
मिली जानकारी के अनुसार, पार्षदों की नाराजगी की मुख्य वजह नगर पंचायत अध्यक्ष मानी मोहित सतपति की कार्यप्रणाली को बताया जा रहा है। नाराज पार्षदों का आरोप है कि नगर पंचायत क्षेत्र में अपेक्षित विकास कार्य नहीं हो पा रहे थे। विकास कार्यों और नगर पंचायत के कामकाज को लेकर पार्षद पिछले कुछ समय से असंतोष जता रहे थे।
बताया जा रहा है कि समय के साथ यह नाराजगी बढ़ती गई और आखिरकार मामला पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने तक पहुंच गया। इसके बाद 8 पार्षदों ने सामूहिक रूप से अपना इस्तीफा जिला भाजपा अध्यक्ष को भेज दिया।
15 में से 8 पार्षदों का इस्तीफा, संगठन में बढ़ी बेचैनी
पुसौर नगर पंचायत में कुल 15 पार्षद हैं और भाजपा के पास बहुमत है। ऐसे में भाजपा के 8 पार्षदों का एक साथ पार्टी छोड़ना महज इस्तीफा नहीं, बल्कि स्थानीय संगठन के लिए गंभीर राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। खास बात यह है कि इस्तीफा देने वाले पार्षदों की संख्या नगर पंचायत की कुल सदस्य संख्या के आधे से भी अधिक है।
सामूहिक इस्तीफे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा संगठन इस नाराजगी को किस तरह देखता है और डैमेज कंट्रोल के लिए क्या कदम उठाता है।
क्या टूटेगा अंदरूनी असंतोष का बांध?
एक साथ 8 पार्षदों के इस्तीफे ने भाजपा के स्थानीय संगठन के भीतर चल रहे असंतोष को सार्वजनिक कर दिया है। हालांकि पार्षदों के अगले राजनीतिक कदम को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन उनके सामूहिक इस्तीफे ने पुसौर की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
अब निगाहें जिला भाजपा नेतृत्व और नगर पंचायत पर टिकी हैं। संगठन इस्तीफे स्वीकार करता है या पार्षदों से बातचीत कर विवाद सुलझाने की कोशिश करता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
फिलहाल पुसौर में एक साथ 8 भाजपा पार्षदों के इस्तीफे ने स्थानीय सियासत का तापमान बढ़ा दिया है। बहुमत वाली भाजपा के भीतर आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं कि 8 पार्षदों को एक साथ पार्टी छोड़ने का फैसला लेना पड़ा—यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
