रायपुर – छत्तीसगढ़ में हर ग्रामीण परिवार तक नल से पानी पहुंचाने के दावे के बीच जल जीवन मिशन की जमीनी हकीकत पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। योजना के तहत प्रदेश में करीब 11000 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद कई इलाकों में नल तो नजर आ रहे हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं आ रहा। कहीं पानी की टंकी महीनों से अधूरी पड़ी है तो कहीं पाइपलाइन और स्रोत की व्यवस्था ही सवालों के घेरे में है।
27 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल के साथ हुई बैठक में छत्तीसगढ़ के सांसदों ने योजना की प्रगति को लेकर खुलकर सवाल उठाए। सांसदों ने कहा कि कागजों में प्रगति दिखाई जा रही है, लेकिन गांवों में जाकर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।
11000 करोड़ खर्च, फिर भी नल सूखे—तो आखिर पानी गया कहां?
जल जीवन मिशन की शुरुआत ग्रामीण परिवारों को घरेलू नल कनेक्शन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। राज्य में 40 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन देने का दावा किया गया है। लेकिन पेपर कटिंग में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक मिशन की जमीनी प्रगति पर जनप्रतिनिधियों ने ही सवाल खड़े किए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, नल कनेक्शन भी दिए जा चुके हैं, तो फिर गांवों के नलों में पानी नियमित क्यों नहीं पहुंच रहा?
यानी तस्वीर कुछ ऐसी बन रही है—नल लगा, टंकी खड़ी हुई, पाइपलाइन बिछी… लेकिन पानी रास्ते में ही कहीं गायब हो गया!
2024 में पूरा होना था काम, अब 2028 तक बढ़ी डेडलाइन
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चौबे के अनुसार मिशन का लक्ष्य पहले 2024 तक पूरा करने का था, लेकिन अब इसकी अवधि बढ़ाकर दिसंबर 2028 तक कर दी गई है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राज्य में अभी तक ग्रामीण परिवारों की 100 प्रतिशत कवरेज हासिल नहीं हुई है।
बृजमोहन अग्रवाल बोले—थर्ड पार्टी से इंस्पेक्शन जरूरी
रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने जल जीवन मिशन की प्रगति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो प्रगति बताई जा रही है, वह फील्ड में दिखाई नहीं देती। उन्होंने थर्ड पार्टी से इंस्पेक्शन कराने की जरूरत बताई। उन्होंने रायपुर लोकसभा क्षेत्र के करीब 100 गांवों में पानी के स्रोत की स्थिति की जांच की जरूरत भी बताई।
राज्यसभा सांसद फूलोदेवी नेताम—योजना का भरपूर फायदा नहीं मिल रहा
राज्यसभा सांसद फूलोदेवी नेताम ने साफ कहा कि योजना का भरपूर फायदा नहीं मिल रहा है। उन्होंने सरगुजा और बस्तर के माइंस एरिया में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन की समस्या का भी मुद्दा उठाया। इसके अलावा फोल्डर में ट्रेनिंग देने का दावा किए जाने के बावजूद ट्रेनिंग दिखाई नहीं देने की बात भी सामने रखी। मतलब साफ है—कहीं पानी नहीं, कहीं पानी है तो गुणवत्ता का सवाल और कहीं योजना की ट्रेनिंग कागजों में!
विजय बघेल ने उठाया सबसे बड़ा सवाल—धरातल और कागज में फर्क क्यों?
दुर्ग सांसद विजय बघेल ने कहा कि धरातल और कागज में स्थिति अलग-अलग है। उन्होंने योजना का थर्ड पार्टी से ऑडिट कराने की जरूरत बताई और सांसदों को भी योजना की समीक्षा में शामिल करने की बात कही। यही वह सवाल है जो पूरी योजना की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है—अगर कागज कुछ और कह रहे हैं और गांव कुछ और, तो फिर सही तस्वीर किसे माना जाए?
टंकी बनी या सरकारी फोटो सेशन का मंच?
बालोद में पानी की टंकी का उदाहरण भी दिया गया है, जहां टंकी करीब आठ महीने से निर्माणाधीन बताई गई, जबकि बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब टंकी ही समय पर तैयार नहीं होगी तो घरों तक पानी कैसे पहुंचेगा?
सांसदों ने सर्वे और टेंडर प्रक्रिया में लापरवाही के आरोप भी उठाए हैं। साथ ही धरातल और कागजों में स्थिति अलग-अलग होने की बात कही गई है।
व्यंग्य में सवाल—’नल’ आया, अब ‘जल’ कब आएगा?
जल जीवन मिशन का मकसद सिर्फ ग्रामीण घरों के बाहर नल लगाना नहीं, बल्कि उस नल से नियमित और सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है। अगर नल मौजूद है लेकिन पानी नहीं, तो योजना की सफलता का पैमाना आखिर क्या माना जाए?
11000 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी अगर ग्रामीण पानी का इंतजार कर रहे हैं, तो सवाल सिर्फ नल का नहीं, निगरानी और जवाबदेही का भी है। अब जरूरत है कागजों के आंकड़ों से बाहर निकलकर गांव-गांव वास्तविक सत्यापन करने की। क्योंकि जनता को आंकड़ों में नहीं, अपने घर के नल में पानी चाहिए।सवाल सीधा है—जल जीवन मिशन में ‘जीवन’ कब आएगा और नलों में ‘जल’ कब बहेगा?
