छत्तीसगढ़ – राजधानी रायपुर नगर निगम एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला किसी निर्माण कार्य या सड़क का नहीं, बल्कि एक ऐसे दिशा-सूचक बोर्ड का है जिसने नगर निगम की कार्यशैली, अधिकारियों की मॉनिटरिंग और जनप्रतिनिधियों की सतर्कता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। जिस बोर्ड का उद्देश्य लोगों को सही रास्ता दिखाना था, उसी बोर्ड ने निगम की बड़ी लापरवाही उजागर कर दी।
मामला शहीद हेमू कलानी वार्ड का है। क्षेत्र में लगाए गए ‘पार्षद निवास’ के दिशा-सूचक बोर्ड पर वार्ड का क्रमांक 35 अंकित कर दिया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि शहीद हेमू कलानी वार्ड का क्रमांक 28 है। बोर्ड पर पार्षद कृतिका जैन का नाम भी दर्ज है, लेकिन वार्ड नंबर की इस मूलभूत गलती ने पूरे मामले को चर्चा का विषय बना दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस बोर्ड का डिजाइन किसने तैयार किया? इसे किस अधिकारी ने मंजूरी दी? बोर्ड छपने से पहले इसकी जांच किसने की? और जब इसे लगाया गया, तब किसी की नजर इस गंभीर त्रुटि पर क्यों नहीं गई? नगर निगम में क्या अब बिना सत्यापन के ही सरकारी काम पूरे किए जा रहे हैं?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक नंबर की गलती नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में व्याप्त लापरवाही का जीवंत उदाहरण है। जिस निगम पर शहर के विकास, सफाई, सड़क, जल निकासी और करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की जिम्मेदारी है, वह अपने ही वार्ड का सही क्रमांक तक नहीं लिख पा रहा है। ऐसे में बड़े विकास कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्षेत्र के नागरिकों एवं सोमेन चटर्जी का कहना है कि इस बोर्ड को तैयार करने, छपवाने और लगाने में सरकारी धन खर्च हुआ है। यदि गलती सामने आने के बाद इसे बदलना पड़ेगा तो फिर दोबारा भी जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च होगा। आखिर इस अतिरिक्त खर्च की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या यह सरकारी धन का खुला दुरुपयोग नहीं है?
लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि यदि पार्षद के निवास तक पहुंचाने वाले बोर्ड पर इतनी बड़ी गलती हो सकती है तो शहर में लगे अन्य सूचना बोर्डों की स्थिति क्या होगी? क्या उनकी भी जांच की जाएगी या फिर इसी तरह गलत जानकारियों के सहारे सरकारी काम चलता रहेगा?
राजनीतिक गलियारों में भी यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष इसे नगर निगम की कार्यप्रणाली की पोल बता रहा है, जबकि आम नागरिक इसे प्रशासनिक उदासीनता का प्रमाण मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि एक साधारण बोर्ड लगाने में भी इतनी बड़ी चूक हो सकती है तो करोड़ों रुपये की योजनाओं में कितनी गंभीर लापरवाही हो रही होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
अब शहरवासियों की मांग है कि इस पूरे मामले की जिम्मेदारी तय की जाए। जिस अधिकारी या एजेंसी ने गलत जानकारी वाला बोर्ड तैयार कराया, उसके खिलाफ कार्रवाई हो। साथ ही नगर निगम शहरभर में लगे ऐसे सभी बोर्डों का सत्यापन कराए ताकि भविष्य में इस तरह की शर्मनाक स्थिति दोबारा पैदा न हो।
फिलहाल यह एक बोर्ड राजधानी में चर्चा का बड़ा विषय बन चुका है। लोगों का कहना है कि नगर निगम पहले अपने रिकॉर्ड और व्यवस्था को दुरुस्त करे, क्योंकि जब सिस्टम ही अपने वार्ड की पहचान भूल जाए तो जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। अब देखने वाली बात होगी कि नगर निगम इस गलती को सिर्फ एक टाइपिंग मिस्टेक बताकर टालता है या फिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई कर जनता को जवाब भी देता है।
