रायपुर। छत्तीसगढ़ के सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है—“काजू”। मंत्रालय से लेकर वीआईपी सर्किल, क्लबों और सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम तक इसी नाम की फुसफुसाहट सुनाई दे रही है। कोई इसे महज़ अफवाह बता रहा है, तो कोई इसे सत्ता, रसूख और प्रभाव की नई कहानी के रूप में पेश कर रहा है।
दो अफसर, एक नाम और कथित प्रतिस्पर्धा
चर्चाओं के अनुसार, एक चर्चित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और मॉडल “काजू” को लेकर दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कथित रूप से अदृश्य प्रतिस्पर्धा चल रही है। कहा जा रहा है कि इनमें एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का अधिकारी है, जिसकी पोस्टिंग बस्तर क्षेत्र में बताई जा रही है, जबकि दूसरा भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का अधिकारी दिल्ली में पदस्थ होने की चर्चा है। सत्ता के गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि 30 दिन के महीने में काजू अपना समय दोनों के बीच बांटती है—15 दिन एक के साथ और 15 दिन दूसरे के साथ। हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है और इन्हें केवल राजनीतिक व प्रशासनिक हलकों में चल रही चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
लग्जरी गाड़ियों और आलीशान दफ्तर की भी चर्चा
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि दोनों कथित तौर पर काजू को प्रभावित करने के लिए एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब वह रायपुर एयरपोर्ट पहुंचती है तो एक अधिकारी की ओर से लग्जरी गाड़ियों—बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज़ और अन्य महंगी कारों—का काफिला उसके स्वागत के लिए खड़ा रहता है। वहीं दूसरी ओर, दूसरी चर्चा यह है कि दूसरे अधिकारी ने कथित तौर पर उसके लिए आलीशान ऑफिस और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
राजधानी रायपुर के वीआईपी चौक स्थित मुद्रा मिनार का नाम भी इन चर्चाओं में बार-बार लिया जा रहा है। दावों के मुताबिक, यहां करीब 1500 वर्गफुट का एक आधुनिक कार्यालय संचालित किया जा रहा है। सत्ता के गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि इस कार्यालय के जरिए करोड़ों रुपये के सरकारी ठेकों से जुड़े काम संचालित किए जा रहे हैं।
संपत्ति, ठेके और प्रभाव को लेकर उठ रहे सवाल
चर्चा यह भी है कि कुछ ही वर्षों में काजू ने कथित रूप से लगभग 50 करोड़ रुपये की संपत्ति खड़ी कर ली है। यह संपत्ति कैसे बनी, इसके पीछे क्या कारोबारी मॉडल है और इसमें सरकारी ठेकों की कोई भूमिका है या नहीं—इसे लेकर तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं। लेकिन इन सभी दावों का कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ या आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है। पर सारे प्रमाण और दस्तेवाज के लिए टीम तफ्तीश में लगी है।
सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया जा रहा है कि यदि इन चर्चाओं में जरा भी सच्चाई है, तो क्या सरकारी संसाधनों का निजी संबंधों के लिए उपयोग किया जा रहा है? क्या सरकारी प्रभाव का इस्तेमाल किसी निजी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है? और यदि सरकारी ठेकों में किसी प्रकार का प्रभाव इस्तेमाल हुआ है, तो उसकी जांच कौन करेगा?
फिलहाल पुष्टि नहीं, लेकिन चर्चा चरम पर
फिलहाल पूरा मामला चर्चाओं, दावों और राजनीतिक फुसफुसाहटों तक सीमित है। किसी भी संबंधित अधिकारी, विभाग या संबंधित महिला की ओर से इन आरोपों की पुष्टि या खंडन सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। ऐसे में इन चर्चाओं को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
फिर भी, राजधानी के सत्ता गलियारों में यह कथित “प्रेम प्रतियोगिता” इन दिनों सबसे चर्चित विषय बनी हुई है। लोग इसे प्रशासनिक मर्यादा, सत्ता के प्रभाव और निजी संबंधों के कथित मेल के रूप में देख रहे हैं। यदि भविष्य में इन दावों से जुड़े कोई आधिकारिक दस्तावेज़, जांच या साक्ष्य सामने आते हैं, तो यह मामला केवल चर्चा नहीं बल्कि बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
