स्पेशल रिपोर्ट
रायपुर – छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CGMSCL) में आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि नया टेंडर अपनी प्रक्रिया के अंतिम दौर में पहुंच चुका है, Cover-A खुल चुका है और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया भी सामने आ चुकी है, इसके बावजूद पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट (RC) को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कवायद तेज कर दी गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नया रेट कॉन्ट्रैक्ट जारी होने की प्रक्रिया चल रही है, तो पुराने अनुबंध को बढ़ाने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
मामले की शुरुआत Tender No. 10/AYUR-Classical और 11/AYUR-Classical से जुड़ी बताई जा रही है। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू हुई थी। आरोप है कि टेंडर इवैल्यूएशन में देरी के बीच संबंधित फर्म के पुराने 18 माह के रेट कॉन्ट्रैक्ट को छह माह के लिए एक्सटेंड किया गया और इसी दौरान सप्लाई जारी रही। इसके बाद 22 जून 2026 को करीब 17 माह बाद उक्त टेंडर को निरस्त कर दिया गया।

यहीं से पूरा मामला सवालों के घेरे में आता है—जब पुराना टेंडर निरस्त होना था, तो उसके पहले पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को एक्सटेंशन देकर खरीदी क्यों की गई? क्या टेंडर प्रक्रिया को समय पर पूरा नहीं किया जा सकता था? क्या पुराने अनुबंध को बढ़ाने का फैसला प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करता?
इसके बाद CGMSCL ने Tender No. 10, 11, 12 और 13/AYUR-Classical के नए टेंडर 22 जून 2026 को जारी किए। 14 जुलाई को बोली जमा करने की अंतिम तारीख समाप्त हो चुकी है। अब प्रक्रिया कई चरण आगे बढ़ चुकी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार Cover-A खोला जा चुका है और दावा-आपत्ति भी अपलोड हो चुकी है। ऐसे में आरोप लगाने वाले पक्ष का सवाल है कि यदि मूल्यांकन प्रक्रिया अंतिम दौर में है, तो पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बढ़ाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है?
7 अगस्त के आदेश ने बढ़ाई हलचल
मामले में सबसे नया और अहम मोड़ 7 अगस्त 2026 के CGMSCL पत्र से सामने आता है। दस्तावेज में वर्ष 2022 के आयुर्वेदिक दवाओं से जुड़े रेट अनुबंधों को आगे बढ़ाने के संबंध में संबंधित फर्मों से सहमति/सुझाव लेने की प्रक्रिया का उल्लेख है। यानी एक ओर नया टेंडर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को जारी रखने की संभावना पर प्रशासनिक स्तर पर राय ली जा रही है।

यही दोहरी प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। अगर नया टेंडर एक सप्ताह में पूरा किया जा सकता है, तो पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को बढ़ाने की जरूरत क्या है? क्या इससे नई निविदा में शामिल होने वाली दूसरी कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा का समान अवसर प्रभावित नहीं होगा? क्या पुराने अनुबंध को बार-बार बढ़ाने से सरकारी खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता पर सवाल नहीं उठेंगे?
आरोप तो यहां तक हैं कि एक व्यक्ति विशेष अथवा चुनिंदा फर्म को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर प्रक्रिया को धीमा कराया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और संबंधित अधिकारियों/फर्म का पक्ष सामने आना भी आवश्यक है।
‘जल्दबाजी’ पर सबसे बड़ा सवाल
मामले में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि आयुर्वेदिक दवाएं सामान्य परिस्थितियों में जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में नहीं आतीं, ऐसे में आपातकाल जैसी स्थिति में पुराने अनुबंध को तत्काल बढ़ाने का औचित्य क्या है? यदि वास्तव में दवाओं की उपलब्धता को लेकर चिंता है, तो क्या उसी समय नए टेंडर के मूल्यांकन में तेजी लाकर पारदर्शी तरीके से नया रेट कॉन्ट्रैक्ट जारी नहीं किया जा सकता?
अब असली सवाल CGMSCL से है—पुराना कॉन्ट्रैक्ट ही क्यों? नया टेंडर क्यों नहीं?
क्या सरकारी खरीद में बार-बार एक्सटेंशन ही व्यवस्था का आसान रास्ता बन गया है? और यदि नए टेंडर की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, तो पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को बढ़ाने की कवायद से सरकार को वित्तीय नुकसान और प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?
सरकार लगातार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है। ऐसे में CGMSCL से जुड़े इस पूरे मामले में अब सिर्फ फाइलें आगे बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत है कि टेंडर निरस्तीकरण, पुराने RC के एक्सटेंशन, नई निविदा की वर्तमान स्थिति और 7 अगस्त के आदेश—इन सभी बिंदुओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो, ताकि यह साफ हो सके कि यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या इसके पीछे किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई है।
क्योंकि सवाल सिर्फ आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी का नहीं है—सवाल सरकारी धन, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और सुशासन की विश्वसनीयता का है।
