रायपुर – छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CGMSC) में आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी को लेकर अब सवाल सिर्फ टेंडर प्रक्रिया की देरी तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामला पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट के बार-बार विस्तार तक पहुंच गया है। एक ओर नई निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, कवर-A खोला जा चुका है और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया भी सामने आ चुकी है, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2022 के रेट कॉन्ट्रैक्ट को फिर बढ़ाने की कवायद ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस मामले को लेकर 3 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री के नाम शिकायतें भेजी गई हैं। शिकायत में CGMSC की आयुर्वेदिक दवा खरीदी की टेंडर प्रक्रिया, पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट के विस्तार और टेंडर प्रक्रिया में कथित देरी की जांच की मांग की गई है। वहीं CGMSC की ओर से 7 अगस्त को जारी पत्र भी सामने आया है, जिसमें पुराने दर अनुबंध को आगे बढ़ाने को लेकर संबंधित फर्मों से सहमति/सुझाव मांगे जाने की बात सामने आती है।
नया टेंडर खुल चुका तो पुराने रेट की जरूरत क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है। आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए नए टेंडर जारी हो चुके हैं। 22 जून 2026 को Tender No. 10, 11, 12 और 13/AYUR-Classical जारी किए गए और 14 जुलाई 2026 को बोली जमा करने की अंतिम तारीख समाप्त हो चुकी है। इसके बाद कवर-A खुलने और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ चुकी है।

ऐसे में अगर नई निविदा प्रक्रिया अंतिम चरण की ओर है तो पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को फिर विस्तार देने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? यदि वास्तव में दवाओं की तत्काल आवश्यकता है, तो विभाग नई प्रक्रिया को तेज कर सकता है और नया रेट कॉन्ट्रैक्ट जारी कर सकता है। सवाल यह भी है कि जिस प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धी कंपनियों को मौका दिया गया है, उसके समानांतर पुराने अनुबंध को आगे बढ़ाने से प्रतिस्पर्धा और सरकारी खरीद की पारदर्शिता पर क्या असर पड़ेगा
17 महीने तक टेंडर क्यों नहीं खोला गया?
शिकायत के मुताबिक इससे पहले 20 नवंबर 2025 को Tender No. 7, 8 और 11/AYUR-Classical CGMSC की वेबसाइट पर अपलोड किए गए थे। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ने में असामान्य देरी हुई और संबंधित फर्म के पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को पहले 6 महीने और फिर आगे भी जारी रखने की स्थिति बनी।

सबसे चौंकाने वाला सवाल यह है कि करीब 17 महीने बाद 22 जून 2026 को पुराने टेंडर को निरस्त कर दिया गया। आखिर इतने लंबे समय तक टेंडर प्रक्रिया क्यों अटकी रही? उसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया? और अंत में निरस्तीकरण की नौबत क्यों आई? इन सवालों के जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है, क्योंकि सरकारी खरीद में देरी का सीधा असर प्रतिस्पर्धा, कीमत और सरकारी धन पर पड़ सकता है।
आखिर इतनी जल्दबाजी किसके लिए?
शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि आयुर्वेदिक दवाएं जीवनरक्षक दवाओं की श्रेणी में नहीं आतीं, ऐसे में पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को बढ़ाने के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है? क्या किसी विशेष फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश हो रही है?

यह आरोप जांच का विषय है, लेकिन सवाल बेहद सीधा है—जब नया टेंडर प्रक्रिया में है, कवर-A खुल चुका है और नया रेट कॉन्ट्रैक्ट जल्द जारी किया जा सकता है, तब 2022 के रेट कॉन्ट्रैक्ट को बढ़ाने की जरूरत आखिर क्यों?
7 अगस्त का पत्र बना नए विवाद की वजह
CGMSC के 7 अगस्त 2026 के पत्र में पूर्व के आयुर्वेदिक दवा टेंडरों के रेट कॉन्ट्रैक्ट को विस्तारित किए जाने संबंधी सहमति मांगी गई है। पत्र में संबंधित फर्मों से निर्धारित समय के भीतर अपनी सहमति देने को कहा गया है। यही पत्र अब पूरे मामले में सबसे अहम दस्तावेज बनकर सामने आया है।

एक तरफ नई निविदा प्रक्रिया चल रही है, दूसरी तरफ पुराने अनुबंध के विस्तार की प्रक्रिया—इन दोनों को साथ देखकर ही पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि नया टेंडर कुछ ही दिनों में अंतिम रूप ले सकता है तो पुराने अनुबंध का विस्तार किस प्रशासनिक मजबूरी के तहत किया जा रहा है, इसका स्पष्ट जवाब CGMSC को देना चाहिए।
MD रितेश कुमार अग्रवाल से मिलने पहुंचे संवाददाता, एक घंटे इंतजार के बाद मिला ‘मंत्रालय’ का हवाला
इस पूरे मामले पर CGMSC के एमडी रितेश कुमार अग्रवाल का पक्ष जानने के लिए संवाददाता ने कार्यालय पहुंचकर मुलाकात का प्रयास किया। कार्यालय में मौजूद पीए की ओर से पहले पूछा गया कि क्या एमडी से पहले बात हुई है। इसके बाद संवाददाता को विजिटर रूम में बैठने को कहा गया। करीब एक घंटे से अधिक इंतजार के बाद जब दोबारा जानकारी ली गई तो बताया गया कि एमडी मंत्रालय में बैठक के लिए चले गए हैं।

मीडिया को पूरे मामले पर जवाब देने के बजाय मंत्रालय की बैठक का हवाला देकर मुलाकात नहीं हो पाना भी अपने आप में सवाल खड़े करता है।
चेयरमैन दीपक म्हस्के बोले—मामला गंभीर, जानकारी लेंगे
CGMSC के चेयरमैन दीपक म्हस्के ने मामले को लेकर कहा कि इस तरह के विषय उनके संज्ञान में आए हैं। उन्होंने कहा कि टेंडर प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है, लेकिन खबर में उठाए गए बिंदुओं को वे गंभीरता से लेंगे और विभाग से जानकारी लेने का प्रयास करेंगे।
यानी अब गेंद CGMSC के पाले में है। सवाल केवल यह नहीं कि दवा खरीदी होगी या नहीं—सवाल यह है कि सरकारी खरीद की प्रक्रिया किस रेट पर, किस प्रक्रिया से और किस समय पूरी होगी।
अगर नया टेंडर प्रतिस्पर्धी दर पर खरीद का रास्ता खोलता है, तो पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को बार-बार विस्तार देने का औचित्य क्या है? और यदि पुराने अनुबंध का विस्तार जरूरी ही है, तो उसकी प्रशासनिक और वित्तीय मजबूरी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
टेंडर की फाइलें, तारीखें और पत्र अब कई सवालों के गवाह हैं। जांच निष्पक्ष हुई तो तस्वीर साफ होगी कि यह महज प्रशासनिक देरी थी या पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को बचाए रखने की कोई ऐसी कवायद, जिसका फायदा किसी खास आपूर्तिकर्ता को मिल सकता था। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही—नया टेंडर दरवाजे पर है, फिर 2022 का रेट कॉन्ट्रैक्ट बार-बार क्यों?
