रायपुर/बिलासपुर – छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित जल जीवन मिशन को लेकर अब मामला केवल पाइप, टंकी और नल तक सीमित नहीं रह गया है। करोड़ों रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना पर अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सीधी निगरानी रहेगी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के मिशन में किसी भी तरह की ढिलाई अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यही वजह है कि अगली सुनवाई सितंबर 2026 में तय करते हुए कोर्ट ने पूरी प्रगति रिपोर्ट तलब कर ली है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश के कई जिलों से जल जीवन मिशन के अधूरे काम, बंद पड़ी योजनाएं, पानी नहीं देने वाले नल और निर्माण गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। अब हाईकोर्ट की निगरानी ने इस पूरे मामले को नई राजनीतिक और प्रशासनिक गर्मी दे दी है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत में दावा किया कि उसने जल जीवन मिशन के लिए अपने निर्धारित अंशदान से भी अधिक राशि खर्च की है। सरकार के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 3,561 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि केंद्र से प्रतिपूर्ति और स्वीकृत राशि इससे काफी कम रही। राज्य का कहना है कि ग्रामीणों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना उसकी प्राथमिकता है और इसी कारण अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी उठाया गया।
दूसरी ओर केंद्र सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि आगे की वित्तीय सहायता मिशन की ऑपरेशनल गाइडलाइन और तय शर्तों के पालन पर निर्भर करेगी। यानी खर्च का हिसाब, काम की गुणवत्ता और प्रगति रिपोर्ट अब पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।
सबसे अहम बात यह रही कि हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद साफ संकेत दिया कि मामला केवल बजट का नहीं, बल्कि ग्रामीणों के मूल अधिकार—स्वच्छ पेयजल—से जुड़ा हुआ है। इसलिए अदालत इस परियोजना की लगातार मॉनिटरिंग करती रहेगी।
प्रदेश के कई इलाकों में आज भी हजारों परिवार ऐसे हैं, जहां जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन तो बिछ गई, लेकिन पानी नहीं पहुंचा। कहीं टंकियां बनकर तैयार हैं, लेकिन चालू नहीं हुईं। कहीं निर्माण अधूरा है तो कहीं गुणवत्ता को लेकर शिकायतें हैं। ऐसे में अदालत की सख्ती को ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले की चर्चा तेज हो गई है। विपक्ष लंबे समय से जल जीवन मिशन में अनियमितताओं, कमीशनखोरी और अधूरे कार्यों के आरोप लगाता रहा है, जबकि सरकार लगातार दावा करती रही है कि मिशन तेजी से आगे बढ़ रहा है और निर्धारित लक्ष्य पूरे किए जा रहे हैं। अब हाईकोर्ट की निगरानी के बाद दोनों पक्षों के दावों की वास्तविक तस्वीर सामने आने की उम्मीद बढ़ गई है।

आरटीआई एक्टविस्ट राकेश चौबे का कहना है कि यदि अदालत नियमित समीक्षा करती रही तो जिलों में लंबित परियोजनाओं को पूरा करने का दबाव बढ़ेगा। अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही भी तय होगी। यही कारण है कि अब जल जीवन मिशन केवल विकास योजना नहीं, बल्कि जवाबदेही की परीक्षा बन गया है।
सितंबर 2026 में होने वाली अगली सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी रहेंगी। अदालत यह देखेगी कि पिछले निर्देशों पर कितना अमल हुआ, कितने गांवों तक वास्तव में पानी पहुंचा और करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद जमीन पर क्या बदलाव दिखाई दिया।
अब सबकी नजर सितंबर पर…
हाईकोर्ट के इस रुख ने साफ संदेश दे दिया है कि अब केवल कागजी प्रगति से काम नहीं चलेगा। गांव-गांव तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का वादा अब अदालत की निगरानी में है। यदि काम में लापरवाही या देरी मिली तो आने वाले दिनों में और कड़े निर्देश भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में जल जीवन मिशन पर अब पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह मामला सिर्फ योजनाओं का नहीं, बल्कि हर ग्रामीण परिवार के घर तक पानी पहुंचाने के वादे का है।
