रायपुर – कभी बस्तर के घने जंगलों में नक्सलवाद के साये में जिंदगी गुजारने वाली सुकमा के चिंतलनार क्षेत्र की आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों के जीवन में अब बदलाव की नई कहानी लिखी जा रही है। मुख्यधारा से जुड़ने के बाद इन महिलाओं ने पहली बार रायपुर की धरती पर कदम रखा और अपने हुनर को बड़े मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर हासिल किया।
इसी कड़ी में सुकमा की आत्मसमर्पित महिला नक्सली ग्रामोद्योग विभाग के सचिव एवं आईएएस अधिकारी राजेश सिंह राणा के रायपुर स्थित निवास पहुंचीं। इस दौरान उन्होंने परिवार के साथ आत्मीय समय बिताया और अपने जीवन में आए सकारात्मक बदलावों को साझा किया।

महिलाओं ने कहा कि बस्तर के जंगलों और सुकमा के चिंतलनार से निकलकर पहली बार वे रायपुर आई हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें सुकमा से रायपुर लाकर मुख्यधारा से जुड़ने तथा अपने हुनर को बड़े मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। इस पहल के लिए उन्होंने श्री राजेश सिंह राणा के प्रति आभार जताया।
महिलाओं के लिए यह मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उनके बदलते जीवन का भावनात्मक पड़ाव भी रहा। कभी हिंसा और भय के माहौल में जीवन बिताने वाली इन महिलाओं के चेहरे पर अब आत्मविश्वास और अपने भविष्य को लेकर उम्मीद नजर आई।

इस अवसर पर राजेश सिंह राणा ने सभी महिलाओं को विश्व आदिवासी दिवस की बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि समाज की मुख्यधारा से जुड़कर महिलाएं अपने हुनर और मेहनत के जरिए आत्मनिर्भर बनें, यही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
हुनर को मिलेगा रोजगार का सहारा
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में ग्रामोद्योग विभाग ने इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। सचिव राजेश सिंह राणा ने विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि सभी महिलाओं को उनकी रुचि के अनुसार हथकरघा प्रशिक्षण दिया जाए।

हथकरघा प्रशिक्षण के तहत महिलाओं को हाथ से चलने वाले करघे पर कपड़ा बुनने का हुनर सिखाया जाएगा। इसके साथ ही उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से करघे भी उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया जाएगा।
इस पहल का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि महिलाओं को स्थायी आजीविका का साधन उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।
रैंप से रोजगार तक, बदल रही है पहचान
सुकमा की इन महिलाओं ने हाल ही में रायपुर में आयोजित बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास का प्रदर्शन कर यह संदेश दिया कि मौका मिले तो बस्तर की महिलाएं भी किसी से पीछे नहीं हैं।

नक्सलवाद की राह छोड़कर विकास और आत्मनिर्भरता की राह चुनने वाली इन महिलाओं की कहानी अब बदलाव की मिसाल बन रही है। सरकार और प्रशासन की पुनर्वास नीति के साथ हुनर, रोजगार और सम्मान के अवसर मिलने से इनके जीवन को नई दिशा मिल रही है।
जंगलों की खामोशी से निकलकर अब हथकरघे की खनक और आत्मनिर्भरता की पहचान—सुकमा की इन महिलाओं की नई कहानी बस्तर में बदलाव की उम्मीद को मजबूत कर रही है।
