छत्तीसगढ़ – विधायक निधि से कराए गए विकास कार्यों पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार मामला बेमेतरा के साजा विधानसभा क्षेत्र के 40 सरकारी स्कूलों के लिए खरीदे गए कंप्यूटर सेट का है, जहां बाजार मूल्य की तुलना में लगभग चार गुना अधिक कीमत पर खरीद किए जाने का दावा सामने आया है। शुरुआती पड़ताल में करीब ₹70 लाख के मूल्य अंतर का मामला उजागर होने के बाद पूरे प्रकरण पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2024-25 और 2025-26 में विधायक निधि के माध्यम से लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से स्कूलों के लिए कंप्यूटर सेट खरीदे गए। लेकिन खरीद से जुड़े दस्तावेजों और बाजार दरों का मिलान करने पर कीमतों में भारी अंतर दिखाई दे रहा है। आरोप है कि जिस कंप्यूटर सेट की वास्तविक कीमत करीब ₹83 हजार के आसपास है, उसी को कागजों में लगभग ₹3 लाख 8 हजार दर्शाकर खरीदा गया। यदि यह तथ्य सही साबित होता है तो यह केवल अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा।
मामले में सबसे बड़ा सवाल खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठ रहा है। बताया जा रहा है कि कई स्कूलों में कंप्यूटर पहुंचाने वाली फर्म का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। यहां तक कि सप्लाई करने वाले वाहन का कॉन्ट्रैक्टर नंबर तक उपलब्ध नहीं बताया जा रहा। इससे यह आशंका और गहरा गई है कि पूरी प्रक्रिया को जानबूझकर अपारदर्शी बनाया गया।
जानकारी के मुताबिक कई स्कूलों में कंप्यूटर सीधे पहुंचा दिए गए, जबकि संबंधित अधिकारियों के पास खरीद और वितरण से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर करोड़ों रुपये की खरीद बिना पूरी प्रशासनिक निगरानी के कैसे पूरी हो गई।
खरीद में तकनीकी मानकों को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। दस्तावेजों के अनुसार कंप्यूटर सेट में इंटेल कोर आई-3 प्रोसेसर, 8 जीबी रैम और 19 इंच एलईडी डिस्प्ले जैसी सामान्य कॉन्फ़िगरेशन शामिल है। जानकारों का कहना है कि इस श्रेणी का कंप्यूटर बाजार में कहीं कम कीमत पर उपलब्ध है। ऐसे में प्रति सेट लाखों रुपये का भुगतान किस आधार पर किया गया, यह जांच का विषय बन गया है।
मामले को और गंभीर बनाता है स्कूलों से सामने आया एक और दावा। कुछ संस्था प्रमुखों के अनुसार फर्म के लोग स्कूल पहुंचे, कंप्यूटर लगाए, उनके साथ फोटो खिंचवाई और फिर एक कंप्यूटर सेट वापस अपने साथ ले गए। यदि यह दावा सही है तो यह केवल महंगी खरीद का मामला नहीं बल्कि आपूर्ति व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल है। इससे यह संदेह पैदा होता है कि कहीं रिकॉर्ड और वास्तविक सप्लाई में अंतर तो नहीं रखा गया।
इस पूरे मामले पर स्थानीय विधायक ईश्वर साहू ने भी नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन से जवाब मांगा है। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा अधिकारियों, कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी से पूरे प्रकरण की जानकारी तलब की है। विधायक का कहना है कि यदि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है तो जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनता के पैसे से किए गए विकास कार्यों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
दूसरी ओर जिला प्रशासन ने भी मामले को गंभीरता से लेने के संकेत दिए हैं। कलेक्टर प्रतिष्ठा ममगाई ने कहा है कि यदि शिकायत और दस्तावेजों के आधार पर अनियमितता सामने आती है तो पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।
हालांकि खंड शिक्षा अधिकारी डीजी पात्रा ने अपने स्तर पर किसी भी खरीद में प्रत्यक्ष भूमिका से इनकार करते हुए कहा है कि उन्हें इस संबंध में सीमित अवधि के लिए ही जिम्मेदारी मिली थी और पूरी जानकारी मिलने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि बाजार मूल्य और भुगतान की गई राशि में वास्तव में लगभग ₹70 लाख का अंतर है, तो इसका लाभ किसे मिला? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर सुनियोजित तरीके से सरकारी धन की बंदरबांट की गई? आने वाली जांच इस पूरे मामले की सच्चाई सामने लाएगी, लेकिन फिलहाल विधायक निधि से हुई यह खरीद शिक्षा व्यवस्था से ज्यादा भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण चर्चा में है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह मामला राज्य के बड़े वित्तीय घोटालों में शामिल हो सकता है।
